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दशक भर पहले तक, गली के नुक्कड़ पर सिगरेट पीता हुआ कोई युवक अगर अपने से किसी बड़े को देख लेता था, तो हाथ पीछे कर लेता था। वह डर 'खौफ' का नहीं, बल्कि 'लोकलाज' और 'मर्यादा' का था। आज वही धुआँ छल्ले बनकर सोशल मीडिया की रील में उड़ रहा है। यह बदलाव रातों-रात नहीं आया, इसे बहुत करीने से हमारे दिमागों में रोपा गया है।
1. पर्दे का तिलस्म: 'कबीर सिंह' से लेकर 'रॉकी भाई' तक
मनोरंजन जगत ने नशे को एक "गहन व्यक्तित्व" (Deep Personality) का जामा पहना दिया है।
मानवीय पहलू: फिल्मों और वेब सीरीज में नायक को तब नशा करते दिखाया जाता है जब वह दुखी होता है, उसका दिल टूटता है या वह बहुत बड़ा काम कर रहा होता है। दर्शकों, विशेषकर युवाओं के अवचेतन मन में यह बैठ गया कि "अगर आप प्रतिभाशाली हैं या आप दर्द में हैं, तो नशा करना आपकी गहराई को दर्शाता है।"
ग्लैमराइजेशन: गानों के शोर में "दारू" और "शॉट" जैसे शब्दों को उत्सव का पर्याय बना दिया गया। अब शादी हो या गम, बिना नशे के उसे 'अधूरा' माना जाने लगा है।
2. मानसिक ढाल: "स्ट्रेस" का झूठा बहाना
आज का दौर प्रतिस्पर्धा का है, और इस दौड़ में उपजे तनाव को हमने नशे के लिए 'वैध लाइसेंस' मान लिया है।
अकेलापन और स्क्रीन: हम हजारों 'फ्रेंड्स' और 'फॉलोअर्स' के बीच सबसे ज्यादा अकेले हैं। पहले दुख बांटने के लिए कंधे होते थे, अब सिर्फ स्मार्टफोन हैं। जब इंसान को कोई सुनने वाला नहीं मिलता, तो वह उस 'सुकून' की तलाश करता है जो बोतल या धुएँ के रूप में तुरंत मिल जाता है।
तर्क का पतन: "एक दिन तो मरना ही है" या "ज़िन्दगी छोटी है, मज़े करो"—ये वाक्य दरअसल आत्मसमर्पण हैं। यह उस लड़ने की शक्ति का अंत है जो हमारे पूर्वजों में हुआ करती थी।
3. कॉर्पोरेट चक्रव्यूह: स्टेटस का नया पैमाना
बड़ी कंपनियों ने अपनी मार्केटिंग रणनीति को बहुत चालाकी से बदला है।
सोबर यानी 'बोरिंग': अब विज्ञापन यह नहीं कहते कि शराब पीना बहादुरी है, बल्कि वे यह अहसास कराते हैं कि अगर आप पार्टी में 'ड्रिंक' नहीं कर रहे, तो आप 'आउटडेटेड' या 'बोरिंग' हैं।
Status Symbol: महँगी वाइन या खास ब्रांड के सिगार को रईसी और ऊँचे सामाजिक दर्जे (High Status) से जोड़ दिया गया है। यह 'दिखावे की संस्कृति' का ही हिस्सा है जिसने मध्यम वर्ग को अपनी चपेट में ले लिया है।
4. जब 'पाप' एक 'विचार' बन जाए
सबसे खतरनाक मोड़ तब आता है जब समाज किसी गलत काम को 'गलत' कहना बंद कर दे।
सामूहिकता का अंत: अब माता-पिता भी कई बार आधुनिक दिखने के चक्कर में बच्चों के साथ "चीयर्स" करने में गर्व महसूस करते हैं। जो बुराई पहले घर के बाहर थी, उसे हमने ड्राइंग रूम तक जगह दे दी है।
पीढ़ियों का नुकसान: जब नशा एक 'लाइफस्टाइल' बन जाता है, तो आने वाली नस्लों के लिए वह एक सामान्य व्यवहार होता है। एक विचार को बदलने में सदियाँ लगती हैं, और हम उसी वैचारिक पतन के मुहाने पर खड़े हैं।


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