सुबह की पहली किरण के साथ जब हम चाय की चुस्की लेते हैं, तो हमें लगता है कि हम दिन की ताज़गी भरी शुरुआत कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि उस एक कप चाय से लेकर रात के खाने तक, हम अनजाने में रसायनों (Chemicals) का एक 'कॉकटेल' पी रहे हैं। भारत जैसे देश में, जहाँ 'अन्न' को देवता माना जाता था, आज उसी अन्न को मुनाफे की मशीन बना दिया गया है।
1. रसोई का विश्वास: जब ज़ायका ही ज़हर बन गया
पुराने समय में रसोई घर की सबसे पवित्र जगह होती थी। आज वही रसोई मिलावटखोरों की प्रयोगशाला बन गई है।
मसालों में मौत: क्या आपने कभी सोचा है कि जो लाल मिर्च आपकी सब्जी को रंग दे रही है, वह असल में ईंट का चूरा या सिंथेटिक रंग हो सकती है? जो हल्दी सेहत सुधारनी चाहिए, उसमें कैंसर पैदा करने वाला 'लेड क्रोमेट' मिलाया जा रहा है।
दूध और घी का धोखा: त्योहारों के समय 'सिंथेटिक दूध' और 'नकली मावे' की खबरें आती हैं, लेकिन यह धंधा साल के 365 दिन चलता है। हम अपने बच्चों की हड्डियों को मजबूत करने के लिए उन्हें दूध पिलाते हैं, पर असल में हम उन्हें धीमा ज़हर (Slow Poison) दे रहे हैं।
2. व्यवस्था का खोखलापन: फाइलों में सुरक्षित, बाज़ार में असुरक्षित
FSSAI और अन्य नियामक संस्थाओं का काम था हमारी थाली की सुरक्षा करना। लेकिन आज स्थिति यह है:
कागजी कार्रवाई बनाम ज़मीनी हकीकत: लैब टेस्टिंग सिर्फ एक औपचारिकता बनकर रह गई है। भ्रष्टाचार की दीमक ने उन अधिकारियों के ज़मीर को चाट लिया है जिन्हें मिलावट रोकने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। रिश्वत के चंद नोटों के बदले लाखों लोगों की जान दांव पर लगा दी जाती है।
नकली लाइसेंस और ब्रांड: आज बाज़ार में बड़े ब्रांड्स के नाम पर नकली सामान धड़ल्ले से बिक रहा है। एक आम आदमी के लिए असली और नकली की पहचान करना नामुमकिन होता जा रहा है।
3. किसान बनाम कॉर्पोरेट: मिट्टी का विलाप
जो किसान ईमानदारी से प्राकृतिक खेती करना चाहता है, उसे बाज़ार में जगह नहीं मिलती।
कीटनाशकों का तांडव: अधिक पैदावार के लालच में मिट्टी को रसायनों से नहला दिया गया है। कीटनाशक सिर्फ कीड़ों को नहीं मार रहे, वे हमारी मिट्टी को बंजर और हमारे शरीर को बीमारियों का घर बना रहे हैं।
GMO और प्लास्टिक का डर: प्राकृतिक बीजों की जगह अब प्रयोगशालाओं में बने बीजों ने ले ली है। सब्ज़ियों को रातों-रात बड़ा करने के लिए ऑक्सीटोसिन के इंजेक्शन लगाए जा रहे हैं। यह प्रकृति के साथ वो छेड़छाड़ है जिसका हर्जाना हमारी आने वाली पीढ़ियाँ भुगतेंगी।
4. अस्पतालों की भीड़: मिलावट का सीधा परिणाम
आज कैंसर, किडनी फेलियर और छोटी उम्र में डायबिटीज का होना 'नॉर्मल' बात हो गई है।
इंसानियत का कत्ल: पैसे के अंधे लालच में इंसान ही इंसान का दुश्मन बन गया है। अस्पताल भरे पड़े हैं, दवाइयां महंगी होती जा रही हैं, और इन सबके पीछे की मुख्य जड़ वह 'भोजन' है जिसे हम हर रोज़ खा रहे हैं। यह सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक सुनियोजित 'नरसंहार' है।
निष्कर्ष: क्या हम सिर्फ चुपचाप ज़हर पीते रहेंगे?
आंकड़ों में देश की तरक्की दिख सकती है, लेकिन अगर देश का नागरिक शारीरिक और मानसिक रूप से खोखला हो रहा है, तो वह तरक्की एक 'भ्रम' है।
समाधान की दिशा:
जागरूकता: सिर्फ सस्ता सामान मत ढूंढिए, गुणवत्ता की जाँच कीजिए। जागरूक ग्राहक ही मिलावटखोरों की कमर तोड़ सकता है।
लोकल को सपोर्ट: अपने आसपास के उन छोटे किसानों से सीधे जुड़ें जो जैविक (Organic) खेती कर रहे हैं। उन्हें सही दाम दें ताकि वे ईमानदारी से अनाज उगा सकें।
कड़े कानून की माँग: हमें एक सुर में सरकार से माँग करनी होगी कि मिलावटखोरी को 'हत्या के प्रयास' के बराबर माना जाए और इसमें शामिल अधिकारियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले।
मेरा प्रतिवाद (Challenge): क्या आपको लगता है कि सिर्फ सरकार को दोष देना काफी है? क्या एक समाज के तौर पर हम खुद 'सस्ता' और 'चमकदार' ढूंढने के चक्कर में मिलावट को बढ़ावा नहीं दे रहे? जब तक हम गुणवत्ता के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार नहीं होंगे, तब तक यह बाज़ार हमें ज़हर ही परोसता रहेगा। इस बारे में आपकी क्या राय है?

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